Sunday, September 20, 2026

प्रेमचंद

न सोचा था जब मंगवाई थी ये किताबें

कि इन्हें पढ़ कर न रह सकेंगे शांत

गोदान,कफ़न और निर्मला पढ़ने के बाद

लगा कितना सुकून से रह रहा हूं आज


कहानियाँ तो हैं सौ साल पुरानी

पर आज भी इनमें है बहुत सच्चाई


किसानों पे क्या बीतती है

गोदान में इसी की हुई पुकार

दिन भर मेहनत करने के बाद

खाने के लिए जिसपे न हो अनाज

और लुटेरे खड़े हों द्वार पे जिसके

हर रोज़ टिमटिमा कर

ईर्ष्या, प्रकोप और सादगी का वो मेल

और समाज की परंपराओं का वो खेल


रोना तो कुछ नहीं,कफ़न जैसी कहानी पढ़कर

इस दशा में कोई रह सके,यही डाले सिर में चक्कर

फिर न घृणा न प्रतिशोध

मन को लगा जैसे एक आघात

मानो डायन बन कर बैठ गई कोई इसके अंदर

अब शांत होने का खोज रहा वो एक अवसर  


निर्मला पढ़ना न था ज़रा भी निर्मल

ऐसा लगा पढ़के,कैसे कोई जिये इतना कुछ सहकर

शादी रची एक अधेड़ से

जो था उसके बाप की आयु के बराबर

फिर जो घटा उस घर के अंदर

उसने रुला दिया मुझे हर पल पर


कैसे दलदल में फंसे हैं लोग अपने मन के अंदर

आप समझ पाएंगे केवल इन कहानियों को पढ़कर

न वर्णन करने का है मुझमें साहस

न भुला पाना है इतना आसान


प्रेमचंद जो पढ़े एक बार

वो न रोक पाए उसको पढ़ने से बार बार

है जादू ऐसा उनके रचनाक्रम का

घुट घुट के भी चाहे उसे पढ़ना बार-बार


समाज की उन छवियों को दर्शाती ये कहानियां

जिन्हें पढ़कर आप बोलें,हम क्या रो रहे हैं अपनी खुशनसीब ज़िंदगी को लेकर

एक बार पढ़ के देखिए तो साहब 

आपका चरित्र और सोच न बदल दे तो

कर दें हमारी गुस्ताखी माफ!!

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